सुमन और उसके संघर्ष की कहानी
सुमन का बचपन गरीबी की छाया में बीता। उसके पिता रामू, एक छोटे से खेत में मजदूरी करते, और माँ सीता बिस्तर पर पड़ी रहतीं। कभी-कभी तो सुमन और उसका छोटा भाई राहुल पूरा दिन चाय-रोटी पर गुज़ार लेते। फिर भी, सुमन कभी निराश नहीं हुई। वह सुबह चार बजे उठकर घर के काम करती, फिर स्कूल जाती।
एक बार जब स्कूल की फीस भरने के पैसे नहीं थे, तो प्रिंसिपल ने उसे क्लास से बाहर निकाल दिया। सुमन ने रोते हुए कहा, *"सर, मैं पढ़कर कुछ बनना चाहती हूँ!"* उसकी आँखों में दृढ़ता देखकर एक शिक्षिका ने उसकी फीस भर दी।
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सुमन की एक ही दोस्त थी— नीतू, जो उसी गाँव की थी। नीतू के पिता दुकानदार थे, इसलिए वह सुमन की मदद करती। कभी किताबें देती, तो कभी अपना टिफिन बाँट लेती। एक दिन, नीतू ने सुमन को बताया कि शहर में *"मेधावी छात्र छात्रवृत्ति योजना"* के लिए आवेदन आए हैं। सुमन ने उसे भरा और पूरी रात पढ़कर परीक्षा दी।
जब परिणाम आया, तो पूरा गाँव हैरान रह गया— सुमन ने जिले में प्रथम स्थान पाया था! उसे हर महीने 500 रुपये की छात्रवृत्ति मिलने लगी।
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लेकिन सुमन की राह आसान नहीं थी। गाँव के कुछ लोग उसकी सफलता से जलते थे। एक दिन, सरपंच के बेटे ने उसकी कॉपियाँ फाड़ दीं और चिल्लाया, *"गरीबों का बेटी डॉक्टर बनेगी? यहाँ मजदूरी कर!"*
सुमन ने हिम्मत नहीं हारी। उसने रात-रात भर जागकर नई नोट्स बनाईं। उसकी माँ ने उसे हौसला दिया— *"बेटी, तू हार मत मान। तेरी मेहनत रंग लाएगी।"*
सालों की मेहनत के बाद, सुमन ने डॉक्टर की पढ़ाई पूरी की। उसने गाँव लौटकर एक छोटा क्लिनिक खोला, जहाँ वह गरीबों का **मुफ्त इलाज** करती। आज वह न केवल अपने परिवार की गरीबी मिटा चुकी है, बल्कि गाँव की सैकड़ों लड़कियों के लिए प्रेरणा बन गई है।
**सीख:**
- *"संघर्ष ही सफलता की सीढ़ी है।"*
- *"शिक्षा सबसे बड़ा हथियार है, जो गरीबी को हरा सकता है।"*
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